Offer

Gender Equality And Women Empowerment : Nari Sashaktikaran

 लैंगिक समानता और नारी सशक्तिकरण 

Gender Equality And Women Empowerment   

Gender Equality And Women Empowerment : Nari Sashaktikaran
women empowerment


लैंगिक  समानता क्या है ? What is  Gender Equality ?

  मानव समाज स्त्री-पुरुष का व्यवस्थित समुदाय घोषित किया गया है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं एक की अनुपस्थिति में दूसरा निर्जीव हो जाता है दोनों का पारस्परिक संयोग सहयोग ही सृष्टि एवं समाज को गतिशील बनाते हैं वास्तव में स्त्री और पुरुष के बीच सामंजस्य और समरसता की स्थापना ही जीवन को सुखद बना सकती है लिंग समता की अगर बात की जाए तो विश्व में प्रत्येक जीव-जन्तु में दोनों रूप नर-मादा स्वीकार किए गए हैं लिंगके आधार पर असमानता मानव-जाति के नर एवं मादा के जैविक भेद का सूचक है। किसी भी व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन में लिंग परिवर्तन समय और स्थान के अनुसार हो पाना असंभव है। जैविक आधार पर स्त्री-पुरुष की शारीरिक बनावट असमान है उनकी शक्ति तथा मानसिकता में भी असमानताएं पाई जाती हैं दूसरी ओरजैण्डरशब्द को देखें तो महिलाओं एवं पुरुषों, बालकों एवं बालिकाओं की सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्तर पर निर्धारित भूमिकाएं, दायित्व, अधिकार, संबंध इत्यादि शामिल हैं, जो परिवर्तनशील हैं अरस्तु ने स्पष्ट शब्दों में कहा हे - ’’स्त्रियां कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियां हैं संत थामस ने स्त्रियों को अपूर्ण पुरुष की संज्ञा दी है। परन्तु जैविक तत्वों को आधार बनाकर स्त्री को निम्न कहना, यह उसके गरिमामय अस्तित्व को ठेस पहुँचाने के समान है क्योंकि पुरुष कभी किसी बच्चे को जन्म नहीं दे सकता जबकि स्त्रियाँ गर्भधारण की अवस्था से गुज़र कर अपने मातृत्व होने का आनन्द लेती हैं, जैविक कारणों के कारण पुरुष के गर्भधारण की बात असंभव है, क्योंकि यह ईश्वर के नियम के विरुद्ध है यह विचार इस बात की पुष्टि करते हैं कि लिंग समानता - जैविक भेदों या लिंग के आधार पर असमानता नहीं होनी चाहिए।

भारत में लैंगिक  भेदभाव Gender discrimination in India :

      लिंग असमानता का विकृत रूप जन्म से ही आरम्भ हो जाता है यदि हम भारत में लिंग आधारित सामाजिक भेदभाव के बारे में विचार करें तो यह असमानता महिलाओं को हीन भावना और कुंठाओं से ग्रस्त बनाती है। भारतीय समाज में व्याप्त विविध क्षेत्रों से जुड़ी भूमिकाओं और उनसे सम्बन्धित उद्बोधनों में पुरुष का स्वामीत्व ही दृष्टिगोचर होता है इसके विपरीत पाश्चात्य देशों में नारी स्वतन्त्रता के नाम पर स्त्रियों ने प्रतीकात्मक रूप में न्यायालयों में अथवा सार्वजनिक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाकर स्वतंत्रता का आगाज़ किया है इस्लामिक देशों में भी स्त्री के मत कोआधा मत की संज्ञा से अभिहित किया गया है जिस नारी स्वतन्त्रता को भारतीयों में अपनाने की सोची जा रही है, वह तो युगों-युगों से ही उसके पास थी, केवल उसकी संभाल में वह असफल रही है हमारे धर्म ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते दिखाई पड़ते हैं कि यह मातृसत्ता से पितृसत्ता में किस तरह परिवर्तित हो गई इस पर एंगेल्स के विचार कुछ इस प्रकार हैं - ’’पाषाण काल में खेती का अधिकारी पूरा कबीला होता था और औरत बागवानी संभालती थी श्रम के इस आदिम विभाजन के काल में स्त्री और पुरुष पारस्परिक समानता के आधार पर समाज को संगठित कर रहे थे वस्तुतः अधिक शारीरिक शक्ति की अपेक्षा वाले काम पुरुष और हल्के काम स्त्रियाँ करती थीं धातुओं के सम्बन्ध में जानकारी बढ़ने के साथ विकास की संभावनाएं अधिक व्याप्त हुईं। व्यक्तिगत सम्पत्ति के लोभ से पुरुष में स्वामित्व की भावना विकसित हुई वह जमीन का मालिक था, गुलामों का मालिक था, और अब स्त्री का भी मालिक बन गया यहीं से औरत की गुलामी की कहानी शुरु होती है जिस स्थिति ने घरेलू कामकाज संभालने के कारण औरत को परिवार में सर्वोच्च सत्ता के सिंहासन पर बिठाया था, वही अब औरत की गुलामी का आधार बन गई हिन्दु पौराणिक ग्रंथों को ही आधार मानें तो मातृसत्ता से पितृसत्ता में वर्चस्व हस्तांतरण की यह प्रक्रिया साफ दिखाई पड़ती है महाभारत में कई ऐसी मनुष्य की मौलिक चाह दूसरों पर शासन करने की रहती है, इसलिए स्त्री दमन का मौलिक कारण मन की अन्तर्वृत्ती चेतना है और पितृसत्ता इसी दमनकारी चेतना का ही रूप है पितृसत्ता ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के साथ धर्म के हथकंडों को कई तरह से प्रयोग करके स्त्रियों का शोषण किया वह सदैव स्त्री की स्वतन्त्र सत्ता से भयभीत रहा है पितृसत्ता के विभिन्न पहलुओं पर विचार करके राजेन्द्र यादव  लिखते हैं - ’’इस सारे साहित्यिक और सांस्कृतिक गरिमामय शब्दजाल से आदमी ने औरत की जिस एक चीज़ को मारा, कुचला या पालतू बनाया है, वह है उसकी स्वतन्त्रता आदमी हमेशा नारी की स्वतन्त्र सत्ता से डरता रहा है और उसे ही उसने बाकायदा अपने आक्रमण का केन्द्र बनाया है, अपनी अखंडता और सम्पूर्णता में नारी दुर्जेय और अजेय है वहां यह एक ऐसी शक्ति का पुंज है जो स्वतन्त्र और स्वच्छन्द है इसलिए आदमी ने उसे तोड़ा है, तोड़कर ही किसी को कमज़ोर और पालतू बनाया जा सकता है आदमी ने लगातार और हर तरह कोशिश की है कि उसे परतंत्र और निष्क्रिय बनाया जा सके ’’

महिला सशक्तिकरण का जनम व् विकास Birth and women development of women empowerment


सशक्तिकरण का पहला बिन्दु है, अपने फैसले खुद करने का अधिकार । यानि एक और अपनी छवि को और दूसरी ओर अपने कर्म को निर्धारित करने का अधिकार । यह किसी के देने से मिलने वाला अधिकार नहीं है, खुद बढ़कर लेना होता है । उसे सशक्त बनाने हेतु सरकार द्वारा कई महिला अध्ययन विभाग अस्तित्व में आए हैं, जो सक्रिय रूप में काम कर रहे हैं । यह अध्ययन विभाग (डीडब्यूकएस) एन.सी.ई.आर.टी. के अधिदेशानुसार अपने क्रियाकलापों के बारे में योजना बनाता है और उसे कार्यान्वित करता है । शिक्षा के क्षेत्र में अनेक अंतःक्षेपी उपायों के माध्यम से बालिकाओं की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए भी पूर्णतः प्रतिबद्ध है । विभाग ने अनुसंधान, विकास, प्रशिक्षण ओर विस्तारकरण सम्बनधी क्रिया कलापों के आधार पर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 (1992 में हुए संशोधन सहित) और इससे सम्बन्धित कार्यवाई कार्यक्रम के निर्माण और कार्यान्वयन में क्रान्तिक भूमिका अदा की है । 1979 से महिला अध्ययन एकक के रूप में कार्यरत रहने के पश्चात इसे 1989 में महिला अध्ययन एवं सामाजिक विज्ञान के माध्यम से शिक्षा और महिला-सशक्तिकरण की समस्याओं और मुद्दों को नवीन रूप से देखने के लिए विकसित विभाग बना दिया गया । इस विभाग की कुछ भूमिकाएं इस प्रकार हैं -


Gender Equality And Women Empowerment : Nari Sashaktikaran
 Nari Sashaktikaran 

  • संवैधानिक प्रावधानों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एम.पी.ई.) 1986, कार्यवाई कार्यक्रम (पी.ओ.ए.) 1992, सी.ई.डी.ए.डब्लयू और बाल अधिकार (1990) की रूपरेखा के भीतर बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन ।


  •  बालिका शिक्षा तथा महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अनुसंधान, विकास, शिक्षण और विस्तारण कार्यकलापों का प्रारम्भ एवं प्रसार ।
  • बालिका शिक्षा तथा महिला सशक्तिकरण के प्रसार हेतु महिला अध्ययन एवं  अन्य सामाजिक विज्ञान की संकल्पनाओं और विधियों का विकास एवं उनको लागू करना ।
  •  लिंग भेद तथा लिंग असमानता को हटाने के लिए नीति नियोजन, पाठ्यचर्चा  और अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में उपयुक्त अंतःक्षेप ।
  • देष में बालिका षिक्षा एवं विकास के लिए नवाचार एवं कार्यक्रमों के प्रसार में      उत्प्रेरक का कार्य ।
  •  बालिका षिक्षा एवं महिला सषक्तिकरण पर राष्ट्रीय संसाधन केन्द्र का कार्य ।
  •  बालिका षिक्षा, क्षमता निर्माण तथा सषक्तिकरण के क्षेत्र को केन्द्र, राज्यों, स्वयं    सेवी संस्थाओं और अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों को परामर्ष, सेवाएं एवं सहायता  प्रदान करना ।’’


 आधुनिक युग की स्थिति : state of modren age :

       आधुनिक समाज में महिला कल्याण हेतु सरकार द्वारा भी कई अधिनियम प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें ’’एक बराबर पराश्रमिक एक्ट 1926, दहेज रोक अधिनियम 1961, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956, मेडिकल टग्र्नेषन आफ प्रेग्नैंसी एक्ट 1987, बाल विवाह रोकथाम एक्ट 2006, लिंग परीक्षण तकनीक एक्ट 1994, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन षोषण एक्ट 2013 इत्यादि ।’’


       इसप्रकार उन्नीसवीं  ष्षती से आरम्भ हुआ स्त्री स्वाधीनता का स्वर आधुनिक युग में भी रुका नहीं अपितु क्रियाषील है । समय की करबट के साथ ही नारी दमन, दलन और उत्पीड़न से मुक्त होकर बाहर आ रही है । नारी के सम्मान के, नारी की मर्यादा व गरिमा एवं उसके षुभ गुणों को बचाए रखने के लिए यह अत्यंत आवष्यक भी है । नारी को अपनी समानता के स्वर की प्राप्ति के लिए संघर्षरत होना स्वाभाविक भी है किन्तु स्वाधीनता की इस आड़ में अपनी लज्जा रूपी गहने का तिरस्कार करना उसके उपर्युक्त सभी गुणों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है । 19वीं ष्षती के तीसरे दषक तक आते-आते स्त्रियों ने स्वयं आन्दोलन की बागडोर संभाली जिसमें उसके भौतिकवादी चिन्तन के दर्षन होते हैं । ’’1920 में प्रसिद्ध तमिल कवि सुब्रह्मणयम् भारती ने ’स्वाधीनता का नृत्य’ षीर्षक से एक कविता लिखी -



              नाचो ! खुषियां मनाओ,
              जो कहते थे कि स्त्रियों का पुस्तक छूना पाप है, वे मर चुके हैं,
              जो मूर्ख कहते थे कि वे स्त्रियों को घर में कैद कर देंगे ।
              वे अब अपनी सूरत नहीं दिखा सकते ।
              उन्होंने हमारी जगह घर में दिखाई, जैसे हम कोई बैल हों जो,
              चारा खाए, पीटा जाए और मुंह बंद करके काम करे,
              हमने सब खत्म कर दिया है, नाचो गाओ खुषी मनाओ 
  (Gender Equality And Women Empowerment : Nari Sashaktikaran )

       नारियों ने इसी स्वर की तीव्रता में अपने ईष्वरीय रूप माँ की संज्ञा को भुला दिया है । वह पाष्चात्य सभ्यता में रंग चुकी है, भौतिकतावादी बन कर अध्यात्म से कोसों दूर हो रही है । खाने, पीने, ऐष करने को ही जिन्दगी का अंग मान रही है, मातृत्व के अपने पवित्र सम्मान को खोकर परिवार जैसी पवित्र संस्था के पतन का कारण बन रही है । पष्चिमी दृष्टि का अंधानुसरण नैतिकता के आचरण के लिए घातक है । पष्चिमी सभ्यता के अनुसरण के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी संभालना अनिवार्य है । हमारी नैतिक संस्कृति भी हमें समानता का अधिकार देती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता । इसी भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण सामूहिक बलात्कार, दहेज, उत्पीड़न, यौन षोषण इत्यादि की घटनाओं पर काबू पाना कठिन होता जा रहा है । आज भी यह कहावत प्रचलन में है कि ’प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे किसी न किसी स्त्री का हाथ होता है’ किन्तु अगर यह कहा जाए कि असफल व्यक्ति गुण्डे और मवाली पुरुष के पीछे भी स्त्री ही होती है तो यह अकथनीय नहीं है । ’स्त्रीयां अपनी षक्ति को पहचानें, अगर वह स्वयं अपनी षक्ति व स्वतन्त्रता का सही उपयोग करेंगी तो ही उसके अन्तर्विरोधों और विरोधाभासों को सही दिषा प्राप्त हो पाएगी । महिला सषक्तिकरण का उपाय मात्र आरक्षण ही नहीं है अपितु वर्तमान समाज की दषा को उचित बनाने के लिए नर व नारी दोनों को ही अपनी सीमाओं में रेखांकित करना होगा, तभी स्वस्थ समाज की संरचना संभव है । नारी पुरुष की सहयोगी और पूरक है, नारी अपने मातृत्व षक्ति पर ध्यान दे और पुरुष को भी उसे अपनी भागीदार समझना चाहिए। नारी वर्तमान के साथ जुड़े, यही नारी सषक्तिकरण का अन्तिम ध्येय होगा ।
       

.....Gender Equality And Women Empowerment .....



 some important links:


Previous
Next Post »

Thanks for your comment. ConversionConversion EmoticonEmoticon