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Sikh Gurbani (HINDI )- 3

सिक्ख गुरुओं  की बाणी  में  भाषायी सम्बन्ध 


(भाग _३ )

सिक्ख गुरुओं  की बाणी  में  भाषायी सम्बन्ध
Guru Teg Bahadur Ji
छठे स्थान पर श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी है, जिसमें भावों के उद्घाटन को भाषा के माध्यम से कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया कि जिससे डरे और दबे कुचले लोगों में एक नई उत्साह की लहर दौड़ी और उन्होंने अपनी पहचान को समझ कर इस नाशवान् संसार से मोह त्याग कर परम पिता के गुणों का बखान करने की प्रेरणा प्राप्त की । गुरु जी ने  अरबी, फारसी का त्याग कर संस्कृत, हिन्दी और पंजाबी को अपने वाणी में उचित व मुख्य स्थान दिया है । वाणी मूलतः पंजाबी तो है ही साथ ही ब्रज भाषा के बहुत समीप है । भाषा सरल, सुस्पष्ट और बोधगम्य है । पूर्वी क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान जहां लोगों के दुःख-सुख में सम्मिलित होकर उन्हें आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाया वहीं उनकी स्वयं की  वाणी में पूर्वी क्षेत्रों की भाषा का स्पर्श भी होता गया, यही कारण था कि भाषा में शुद्ध ब्रज और हिन्दी का प्रभाव आ जाना । इसके अतिरिक्त अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द भी उपलब्ध होते हैं ।
      तत्सम शब्द "पग", तदभव शब्द "सगल" तथा अवधी के शब्द "जानो" "बखानो" आदि इनके काव्य में यत्र - तत्र  देखने को मिलते हैं । 
      ’’ਸਿਰ ਕੰਪਿਓ  ਪਗ ਡਗਮਗੇ, ਨੈਨ ਜੋਤ ਤੇ  ਹੀਨ ।।’’
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      ’’ਗੁਰੁ ਕਿਰਪਾ ਜਿਹ ਨਰ ਕਉ ਕੀਨੀ ਤਿਹ ਇਹ ਜੁਗਤਿ ਪਛਾਨੀ  ।।’’                   
      सातवें स्थान पर श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी की वाणी है, जिसमें संस्कृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, अवधी, पंजाबी, अरबी, फारसी आदि का जमगड़  देखने को मिलता है । गुरु जी इन सभी भाषाओं में प्रवीण होने थे | उनका शब्दकोश ही इतना विशाल था कि उनकी भाषा ऐसी विचित्रता से अछूती न रह सकी । इनकी कृति "जाप साहिब" पर संस्कृत का प्रभाव है, "चण्डी चरित्र" में ब्रज भाषा का और "चण्डी दी वार" पंजाबी भाषा की उत्कृष्ट रचना है । इनके काव्य में ब्रज भाषा की प्रधानता होने के कारण लगभग सभी भाषाओं को ब्रज भाषा के अनुरूप ही ढाल लिया गया है और ऐसी विशिष्टता के लक्षण केवल इन्हीं के काव्य में परिलक्षित होते हैं । "दशम ग्रंथ" की भाषा दोषपूर्ण होने के बावजूद भी समूचे तौर पर प्रवाहमान और कर्तव्य  परायण है ।
’’ਸਾਧ ਕਰਮ ਜੇ ਪੁਰਖ ਕਮਾਵੈ, ਨਾਮ ਦੇਵਤਾ ਜਗਤ ਕਹਾਵੈ ।
      ਕੁਕ੍ਰਿਤ ਕਰਮ ਜੋ ਜਗ ਮਹਿ ਕਰਹਿ, ਨਾਮ ਅਸੁਰ ਤਿਨ ਕੋ ਸਬ ਧਰਹਿ ।।’’
                                    (ਦਸ਼ਮ ਗ੍ਰੰਥ, ਪ੍ਰ. 48)
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’’ਪਹਲੇ ਚੰਡੀ  ਚਰਿਤ੍ਰ ਬਨਾਯੋ ।
      ਨਖ ਸ਼ਿਖ ਤੇ ਕਰਮ ਭਾਖ ਸੁਨਾਯੋ ।’’ 
(ਬਚਿੱਤਰ ਨਾਟਕ: ਚੌਥਾ ਅਧਿਆਏ )
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      ਹਮ ਇਹ ਕਾਜ ਜਗਤ ਮੋ ਆਏ, ਧਰਮ ਹੇਤ ਗੁਰਦੇਵ ਪਠਾਏ ।
      ਜਹਾੰ ਤਹਾੰ ਤੁਮ ਧਰਮ ਬਿਥਾਰੋ, ਦੁਸ਼੍ਟ ਦੋਖਿਯਨ ਪਕਰ ਪਛਾਰੋ ।।’’
                                   (ਬਚਿੱਤਰ  ਨਾਟਕ: ਛੇਵਾਂ ਅਧਿਆਏ)
इसप्रकार उनके द्वारा  रचित भिन्न-भिन्न ग्रंथों  में भाषा सम्बन्धी अनेकरूपता के दर्शन दिखाई  देते हैं ।

      उपर्युक्त भाषा की दृष्टि से गुरुओं की वाणी में हिन्दी और पंजाबी भाषा का अन्तस्सम्बन्ध को देखते हुए यह स्पष्ट है कि चाहे गुरु नानक देव जी द्वारा चलाई गई साध भाषा की परम्परा लगभग सभी गुरुओं की वाणी में दृष्टिगोचर होती है फिर भी अवधी, ब्रज, फारसी के साथ-साथ गुरुओं ने पंजाबी लिपि का प्रयोग करते हुए भाषा पर किसी भी प्रकार से दुप्र्रभाव नहीं पड़ने दिया । चाहे लिखित रूप में गुरुमुखी लिपि का प्रयोग किया गया है, किन्तु प्रत्येक भाषा को पूर्ण सम्मान इन गुरु की वाणी में परिलक्षित होता है, जो सभी गुरुओं की वाणी की भाषायी विशिष्टता का एक बेजोड़ नमूना है ।

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