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Hindi Sahitya ka kaal Vibhajan (हिंदी साहित्य : काल विभाजन )

Hindi Sahitya ka kaal Vibhajan(हिंदी साहित्य : काल विभाजन )


हिंदी साहित्य के प्रारंभिक लेखकों ने काल विभाजन की और कोई ध्यान नहीं दिया | इस और अगर सर्वप्रथम किसी ने प्रयास किया तो वो हैं जॉर्ज ग्रियर्सन | इन्होंने इसे 11 भागों में  विभाजित किया _



Hindi Sahitya ka kaal Vibhajan (हिंदी साहित्य : काल विभाजन )

                      काल विभाजन

1 . चारण काल  2 .पन्द्रहवीं शती  का धार्मिक  जागरण  3 . जायसी की प्रेम कविता 4 . ब्रज का कृष्ण सम्प्रदाय 5 . मुग़ल दरबार  6 . तुलसीदास 7 . रीति काव्य 8 . तुलसीदास के अन्य परवर्ती  9 . अट्ठारहवीं शताब्दी  10 . कंपनी के शासन में हिंदुस्तान  11 . विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान
जॉर्ज द्वारा किया गया यह काल विभाजन  तर्कसंगत न हो कर केवल साहित्य के इतिहास के भीं अध्यायों का नामकरण मात्र ही है |
मिश्र बंधुओं के द्वारा किया गया काल विभाजन ग्रियर्सन की अपेक्षा प्रौढ़ तो है किन्तु असंगतियों से पूर्ण है |
                  1 . आरंम्भिक काल _ (क) पूर्वारम्भिक काल (700 _1343 वि. )
                                                   (ख ) उत्तराम्भिक काल (1344 1444 वि. )
                  2 .माध्यमिक काल  _ (क) पूर्व माध्यमिक काल (1445 _1560 वि.)
                                                   (ख ) प्रौढ़ माध्यमिक काल (1561 _1680 वि.)
                   3 .अलंकृत काल   _  (क) पूर्वालङ्कृत काल (1681 _1790 वि.)
                                                   (ख ) उत्तरालंकृत काल (1791 _1889वि.)
                   4 . परिवर्तन काल (1890 _1925 वि.)
                   5 . वर्तमान काल  (1926 वि. _अबतक )

    पांच  भागों में  विभाजित होने के बावजूद भी इसे उपयुक्त स्वीकार नहीं किया गया | सर्वाधिक उपयुक्त एवं तर्कसंगत काल विभाजन की और कार्य करने वाले आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जी हैं ,जिन्होंने संक्षिप्तता ,सरलता और स्पष्टता के साथ इसे कुछ इसप्रकार विभाजित किय कि आज तक हिंदी जगत में बहुमान्य है | राम चन्द्र शुक्ल द्वारा किया गया नामकरण कुछ इस प्रकार है :
1 . आदिकाल (वीरगाथाकाल  सं. 1050 _1375 )
2 . पूर्व मध्य काल (भक्तिकाल सं. 1375 _1700 )
3 . उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल सं. 1700 _1900 )
4 . आधुनिक काल (गद्यकाल सं. 1900 _अब तक )
अतः उपर्युक्त शुक्ल द्वारा किया गया काल विभाजन मानव मनोविज्ञान के आधार पर स्तुत्य है , किन्तु वर्तमान युग में  काफी परिवर्तन हो चुका है  और भी विद्वानों ने काल विभाजन पर अपने मत प्रकट किये हैं ,  जिसे देखते हुए इस में अनेक त्रुटियां दृष्टिगोचर होने लगी हैं किन्तु इसके बावजूद भी इसे इतिहास का नींव पत्थर माना  गया है |

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