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Sikh Gurbani (HINDI) -1


सिक्ख गुरुओं  की बाणी  में  भाषायी सम्बन्ध 

(भाग _१ )

Guru Granth Sahib Ji
ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ  
मध्यकाल में पंजाबी बोली और साहित्य का बहुत विकास हुआ । गुरु नानके देव जी की वाणी में पहली बार  कई प्रकार के लोक प्रचलित काव्य रूप व छन्द मिलते हैं । भाषा में पश्चिमी का अंश, हिन्दवी व साध भाषा का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखता है । इनके अतिरिक्त गुरु अर्जुन देव जी, भाई गुरदास, गुरु गोबिन्द सिंह जी की भाषा पर संस्कृत, फारसी, ब्रज भाषा के सम्पूर्ण लक्षण दिखाई पड़ते हैं । 

आधुनिक काल में पंजाबी साहित्य रचना का कार्य केवल मुस्लिम लेखकों द्वारा ही किया जा रहा था । सिक्खों व हिन्दुओं का ध्यान ब्रज भाषा की ओर ही था । असल में गुरु गोबिन्द सिंह जी के पश्चात् ब्रज भाषा ही हिन्दु सिक्ख पंजाबियों की साहित्यिक भाषा बन कर रह गई थी । पंजाबी के सिंघ सभा लहर ने पंजाबी भाषा की ओर अपना ध्यान व ज़ोर डालना आरम्भ किया और विशेषकर सिक्खों का ध्यान पंजाबी  की ओर खींचा । आधुनिक काल के मुख्य लेखक भाई वीर सिंह, भाई मोहन सिंह वैद, भाई काहन सिंह नाभा आदि की लेखनी ने आरम्भ से ही इस लहर को बढ़ाया । इस प्रकार मुख्य रूप में  दोनों भाषाओं के इतिहास पर दृष्टिपात करने से एक बात तो स्पष्ट है कि पंजाबी पूरी तरह से हिन्दी प्रभावित भाषा है । इसका प्रभाव जहां पंजाबी लेखकों ने स्वीकार किया है वहां सिक्ख गुरुओं ने भी अपनी वाणी को इसी भाषा से अलंकृत किया है । चाहे उन्होंने लिपि गुरमुखी को ही चुना है किन्तु प्रभाव पूर्ण रूप से हिन्दी भाषा का ही है ।

ਲਿਖਾਰੀ
ਲਿਖਾਰੀ 

गुरुओं  की वाणी ने अपनी भाषा के माध्यम से लोगों को संदेश दिया और अच्छा जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा भी दी है । हिन्दी और पंजाबी भाषा का अन्तस्सम्बन्ध गुरुओं की वाणी में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है इसका अध्ययन कुछ इस प्रकार है - सर्वप्रथम गुरु नानक देव जी की वाणी में भाषा का विश्लेषण परिस्थितियों के सन्दर्भ में करना ही उचित रहेगा । गुरु जी के आगमन से पूर्ण बाहरी आक्रमणकारी हिन्दुस्तान में अपना राज्य कायम कर चुके थे और पंजाब की धरती से होकर और इसके जन-जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ गए थे । वे अपनी सभ्यता और संस्कृति का बलपूर्वक प्रभाव डाल रहे थे, इसी कारण फारसी राज भाषा का स्थान ग्रहण कर चुकी थी । इस समय में गुरु जी ने पंजाब की भाषा को अपनी भावाभिव्यक्ति का साधन बनाया और पंजाबी में साहित्य रचना के लिए किवाड़  खोल दिए । आपने जिस भाषा को विचार प्रकट करने का माध्यम बनाया वह पंजाबी प्रभावित सधुकड़ी भाषा है । उनकी रचना ’जपुजी’ साहिब की भाषा में समूचा प्रभाव साध  भाषा का ही पड़ता है ।

द्वितीय गुरु साहिबान श्री गुरु अंगददेव जी की भाषा बहुत ही सरल, स्पष्ट और मन अन्तर की संवेदना को अभिव्यक्त करने में सफल है । आपने भावों को प्रकट करने के लिए पूरी दलील से काम लिया है । उनकी भाषा की विशेषता भी यह है कि इन्होंने कुछ श्लोक ’सहस्कृति’ में भी लिये हैं । जैसे ’माझ की वार’ की 23वीं पउड़ी के साथ आया दूसरा श्लोक तथा ’आसा की वार में’ 12वीं पउड़ी के साथ आए दो श्लोक ’सहस्कृति’ शब्द उस भाषा के लिए प्रयुक्त किया गया है जो संस्कृत की सीमाओं पर पाली और प्राकृत के संयोग के साथ बनी थी और आम तौर पर सिद्धों व नाथों के डेरों में बोली जाती थी ।




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