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Sikh Gurbani (HINDI) - 2

सिक्ख गुरुओं  की बाणी  में  भाषायी सम्बन्ध 

  (भाग _२ )

( क्रम से जुड़ने हेतु भाग-१ देखें )

Guru Granth Sahib Ji
ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ ਜੀ  
तृतीय गुरु श्री गुरु अमरदास जी की वाणी में भी पुरानी हिन्दी का प्रयोग स्पष्ट झलकता है । इन्होंने भाषा को साधारण वर्ग के जिज्ञासुओं की समझ के अनुकूल प्रयुक्त किया है । यह अंश उनके द्वारा रचित चैपाई और अष्टपदियों में स्पष्ट दिखते हैं किन्तु वार और श्लोकों में कम है । इसका कारण है, जहां काव्यगत या शैलीगत रूप है , वह पुरानी हिन्दी परम्परा के अधीन है, वहां सधुकड़ी का प्रभाव है, किन्तु काव्यगत विशेषताओं से पूर्ण होने से इन्हें जन साधारण की भाषा नहीं कहा जा सकता ।

’’ਅਨਦਿਨ ਕੀਰਤਨ ਸਦਾ ਕਰਹਿ ਗੁਰੁ ਕੈ ਸ਼ਬ੍ਦ ਅਪਾਰਾ ।
 ਸ਼ਬ੍ਦ ਗੁਰੁ ਕਾ ਸਦ ਉਚਰਹ ਜੁਗ ਜੁਗ ਵਰਤਾਵਣਹਾਰਾ ।।’’ 
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਅੰਗ 593)
  
’’ਮਿਲ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਜੀਯੋ, ਤੁਦ ਬਿਨ ਖਰੀ ਨਿਮਾਣੀ ।
ਮੈਂ ਨੈਣੀ ਨੀਂਦ ਨ ਆਵੈ ਜੀਯੋ, ਭਾਵੈ ਅੰਨ ਨ ਪਾਣੀ ।

(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਅੰਗ 244)
आध्यात्मिक विषय से सम्बन्धित होने के कारण इसमें आवश्यक गंभीरता भी है और बौद्धिकता स्तर में भी उच्चता है । इनकी भाषा में संस्कृत, अपभ्रंश की विभक्तियों और उकारांत व एकारान्त के प्रयोग आम मिलते हैं । चाहे इनकी वाणी का शब्दकोश विशाल व अमीर है किन्तु तत्सम शब्दों के प्रयोग से दूरी बनाए रखी है । केवल उन्हीं शब्दों को अपनी वाणी में स्थान प्रदान किया, जो लोक प्रचलित थे । इसप्रकार इनकी वाणी में सशक्तता और विषय प्रतिपादन में सफल सिद्ध हुई है ।

चौथे  गुरु श्री गुरु रामदास जी भाषायी दृष्टिकोण से उसी भाषा का अनुसरण करते हैं, जो पूर्व गुरुओं की वाणी का आधार थी । किन्तु आपकी भाषा में अधिकतर पंजाबी भाषा का ही रंग है । चूंकि गुरु गद्दी काल से ही एक ही स्थान पर रहने के कारण सधुकड़ी भाषा की शब्दावली कम दिखाई पड़ती है । भाव तीव्रता के लिए पश्चिमी शब्दावली का प्रयोग करके वाणी को नया रूप प्रदान किया ।

’’ਆਪੇ ਗੋਪੀ ਕਾਨ ਹੈ ਪ੍ਯਾਰਾ ਬਨਿ ਆਪੇ ਗਊ ਚਰਾਹਾ ।
 ਆਪੇ ਸਾਵਨ ਸੁਨ੍ਦਰਾ ਪ੍ਯਾਰਾ ਆਪੇ ਬੰਸ ਬਜਾਹਾ ।’’ 
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਅੰਗ 606)
                                                                                                       
   ’’ਇਹ ਮਾਨਸ ਜਨ੍ਮ ਦੁਰ੍ਲਭ ਹੈ, ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਬਿਰਥਾ ਸਬ ਜਾਏ ।
 ਹੁਣ ਕੌ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਬੀਜਿਯੋ, ਅਗੈ ਭੁਖਾ ਕ੍ਯਾ ਖਾਏ ।।’’ 
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਅੰਗ 450)

इस प्रकार गुरु जी ने अपनी भाषा में जन भाषा का प्रयोग कर लोगों को जागरूकता प्रदान की है और परमात्मा से जोड़ने का प्रयास किया है ।

सिक्ख गुरुओं  की बाणी  में  भाषायी सम्बन्ध
Guru Arjan Dev Ji
पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से एक नए भाषायी सभ्याचार को प्रसारित किया, जिसका विकास परवर्ती पंजाबी में रचे और गुरुमुखी लिपी में लिखे गए इतिहास में  दृष्टांकित होता है । चूंकि इनकी मातृ भाषा पंजाबी थी तो पंजाबी का प्रभाव साहित्य में दिखाई पड़ना स्वाभाविक ही था, किन्तु आपका व्यक्तित्व एवं कृत्तित्व बहुभाषीय विद्वान के रूप में सामने आता है । अपने समय में प्रचलित कई भाषायी परम्परा को परख कर और उसे जन मानस की सूझ-बूझ के अनुसार प्रस्तुत किया है । इन प्रयोगों में  उन्होंने भाव-प्रेषण को सामने रखा । यही कारण है कि संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश आदि भारतीय मूल की भाषाओं का स्वाभाविक रूप में प्रयोग कर अपनी काव्य कुशलता का प्रमाण अपनी रचनाओं में दिया है । उन्होंने ’सहस्कृति’ श्लोकों की रचना की है । ’गाथा’ शीर्षक के अन्तर्गत 24 श्लोकों की रचना की -
’’ਸ਼ੁਭ ਵਚਨ ਰਮਣੰ ਗਵਣੰ ਸਾਧ ਸੰਗੇਣ ਉਧਰਣ: ।
 ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰੰ ਨਾਨਕ ਪੁਨਰਪਿ ਜਨਮ ਨ ਲਭੁਵੇ ।।’’

संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग भी कहीं कहीं दिखाई पड़ता है जैसे अंधकार, सफल, दीपक, परमानन्द, नेत्र, पुराण, पतित, अमर, अजर, नीच, कीट, पावक इत्यादि । इनकी रचनाओं में प्राकृत, अपभ्रंश के साथ-साथ ब्रज भाषा का प्रयोग भी मिलता है किन्तु पंजाबी का प्रभाव हर जगह दृष्टिगोचर होता है । इसप्रकार भाषा न तो शुद्ध ब्रज हैै और न ही सधुकड़ी बल्कि यह पंजाबी साध भाषा है । इन्होंने अपनी वाणी के साथ-साथ 600 साल की भाषायी गतिविधि को संपादित किया और उसे श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत किया ।


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