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वैशाखी पर्व /ਵਿਸਾਖੀ ਮੇਲਾ/Baisakhi


 ਵਿਸਾਖੀ              वैशाखी               Baisakhi 

वैशाखी/baisakhi/ਵਿਸਾਖੀ
ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਖੇਤ  

वैशाखी, एक ऐसा पर्व जिसे उत्तर भारत और दक्षिण भारत के सभी लोग बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । मान्यता यह है कि सूर्य बारह राशियों कि परिकर्मा करने के पश्चात् पुनः मेष राशि में प्रवेश करता है और नव  वर्ष का आरम्भ होता है। पंजाब में  (ਵਿਸਾਖੀ) इस त्योहार का अपना अलग से महत्व है इस दिन किसानों की फ़सल पक कर तैयार हो जाती है और वह पकी हुई फसल को बेच कर खुशी का इज़हार कुछ इस प्रकार करतें हैं –    

       ਤੜੀ ਤੰਦ ਸਾਮ੍ਭ ,ਹਾੜੀ ਵੇਚ ਵਟ ਕੇ,ਲੰਬੜਾੰ ਤੇ ਸ਼ਾਹਾਨ ਦਾ ਹਿਸਾਬ ਕਟ ਕੇ । 
       ਮੀਹਾੰ ਦੀ ਉਡੀਕ ਤੇ ਸਿਯਾੜ ਕਡ ,ਮਾਲ ਢਾੰਡਾ ਸਾੰਭਣੇ ਨੂੰ ਚੂੜਾ ਛਡ ਕੇ ।  
       ਪਗ ਝਗਾ ਚਾਦਰਾਨ ਨਵੇਂ ਸਿਵਾ ਕੇ,ਮਾਨ ਵਾਲੀ ਡਾੰਗ ਉਤ੍ਤੇ ਤੇਲ ਲਾ ਕੇ । 
       ਕਾਛੇ ਮਾਰ ਬੰਝਲੀ ਆਨੰਦ  ਛਾ  ਗਯਾ,  ਮਾਰਦਾ ਦਾਮਮੇਂ ਜਟ ਮੇਲੇ ਆ ਗਯਾ ।                                                                

           तूड़ी तंद साम्भ ,हाड़ी वेच वट के,लंबड़ां ते शाहान दा हिसाब कट के । 
        मीहां दी उडीक ते सियाड़ कड ,माल ढांडा सांभणे नूं चूड़ा छड के ।
        पग झगा चादरान नवें सिवा के,मान वाली डांग उत्ते तेल ला के । 
              काछे मार बंझली आनंद  छा  गया,  मारदा दाममें जट मेले आ गया ।  
  वैशाखी के दिन ही सिक्खों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने शिष्यों की भरी सभा में ललकार लगते हुए  कहा कि क्या कोई है जो धर्म पर बलिदान होना चाहता है ? मेरी तलवार किसी सिक्ख के खून की प्यासी है ।              
baisakhi/ਵਿਸਾਖੀ/वैशाखी
गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी
गुरु जी की यह ललकार सुन कर शिष्यों में सन्नाटा छा गया आखिर उनमें से एक शिष्य उठा ,गुरु जी उसे खेमें में ले गए  और खून से लथ- पथ तलवार ले कर पुनः सभा में आये। इस प्रकार गुरु जी ने पांच बार ललकार लगाई और पांच सिक्खों ने क्रम से गुरु जी के खेमें में जा कर एक अनोखा इतिहास रचा, जो कि पूरे सिख सिक्ख जगत के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बना और पांच सिखों को गुरु जी ने अमृतपान करवा कर सम्पूर्ण सिख बना दिया और एक ऐसे पंथ की स्थापना की जो खालसा पंथ के नाम से जाना गया  । वे पांच सिक्ख पांच प्यारे के नाम से प्रसिद्ध हुए । इस सारे  कार्य के पीछे गुरु जी का एक ही मनोरथ था कि लोगों में जात-पात का भेद भाव समाप्त  करना और मानव को एक होने का                               सन्देश प्रदान करना  ।

baisakhi/ਵਿਸਾਖੀ/वैशाखी
जलियांवाला बाग
इस त्यौहार(Baisakhi) का एक और विशेष ऐतिहासिक  महत्व भी है, १९१९ की वैशाखी को पूरा हिंदुस्तान कभी नहीं भुला पायेगा १३ अप्रैल को जलियांवाला बाग में  बहुत से लोग वैशाखी मनाने के लिए एकत्रित हुए थे  कि अंग्रेजों के अत्याचारों कि हद ही हो गई, इस पर्व पर एकत्रित हुए बेक़सूर लोगों पर अंधाधुन गोलियों की बौछार ने कई माताओं की गोद सूनी कर दी, अनेक पत्नियों के सिन्दूर पोंछ  दिए, बहनो और बेटियों के भाई और पिता कभी वापिस न आ सके ।इस ख़ूनी वैशाखी को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा ।






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