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बाज़ारवाद और हिन्दी


                                                                                                                               

बाज़ारवाद और हिन्दी


हिन्दी

 हिन्दी

 भूमण्डलीकरण के दौर में विश्व एक नवीन रूप से अपनी पहचान बनाता हुआ दिखाई पड़ता है इस दौर में व्यापार का अपना अलग से वर्चस्व कायम हो चुका है इससे बाज़ार की शक्तियां इतनी मज़बूत बन चुकी हैं कि प्रत्येक देश चाहता है कि उसका उत्पाद केवल अपने देश में ही नहीं अपितु दूसरे देशों में भी लोकप्रियता को हासिल कर सके वर्तमान दौर में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, सेवाओं और संसाधनों के मुक्त आदान-प्रदान में छूट प्राप्त हो जाने के साथ-साथ देश की भाषा में विकास को भी सफलता प्राप्त होती दिखाई देती है जो भाषा जितनी उदार होगी और जैसे-जैसे परिवर्तित होगी, वह उतनी ही अधिक प्रसिद्धि प्राप्त करेगी
               
आधुनिक युग में हिन्दी  विश्वभाषा का रूप धारण कर रही है विश्व के लगभग 44 राष्ट्रों के लोगों द्वारा बोली जाने वाली यह भाषा विश्व भाषा का दर्जा हासिल करने में समर्थ बन चुकी है वैश्वीकरण के अन्तर्गत हिन्दी भी आम बोलचाल के साथ-साथ व्यावसायिक भाषा के रूप में जानी जाने लगी है और तो और पश्चिमी देशों में इसका प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा है अमेरिका जैसा देश इसे द्वितीय भाषा के रूप में स्वीकृत कर रहा है वहाँ के लोग बाजार में आम जन-जीवन में हिन्दी को प्रयोग में लाने लगे हैं

बाज़ारवाद
बाज़ारवाद
                जैसा कि विदित है कि आधुनिक काल व्यापार का काल है चाहे ईस्ट इंडिया कम्पनी रही हो अथवा भारतीय व्यापार जगत, हिन्दी सदैव से ही व्यापार को, बाज़ार की प्रशासन की भाषा के रूप में स्वीकृत होती आई है आज मानव-मूल्यों के साथ-साथ जीवन का प्रत्येक क्षेत्र बाज़ारवाद के प्रभाव से अछूता नहीं है भारत जैसे विशाल देश को सदैव ही बाज़ार के रूप में देखा जाता रहा है बाज़ार में व्यापार करने के लिए बेहद आवश्यक है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में जाना जाए ताकि व्यापार को आसान बनाया जा सके इसी उद्देश्य से हिन्दी लोकप्रिय होती जा रही है जीवन से जुड़ा हुआ प्रत्येक क्षेत्र ज्ञान-विज्ञान, पर्यावरण, दर्शन, ज्योतिष, स्वास्थ्य, योग, वित्त, प्रबन्धन, वाणिज्य, तकनीक, सूचना प्रसारण, जन संचार के माध्यम, कृषि, पत्रकारिता आदि सब बाज़ारवाद से प्रभावित हैं साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा पुरातन समय में जहाँ साहित्य की खोज के लिए उधम करना पड़ता था, अपनी रचना को दूसरे तक पहुँचाने की असुविधा होती थी बाज़ारवाद के सहयोग से आज वह बेहद सहज हो चुका है बाज़ारवाद को मुक्त पहचान दिलाने के पीछे भाषा का ही महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होता है

भूमण्डलीकरण के दौर में बाज़ारवाद की प्रक्रिया को चार स्तरों में विभक्त किया जा सकता है -

                (1)          वैज्ञानिक एवं तकनीकी खोज में
                (2)          सूचना क्रान्ति, जनसंचार और मीडिया में
                (3)          आर्थिक उत्पादन वाणिज्य और व्यापार में
                (4)          विस्थापन में
               
                सर्वप्रथम विज्ञान तकनीकी क्षेत्र की बात करें तो सितम्बर 2015 में भोपाल में आयोजित दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन इस बात को स्पष्ट करता है कि पहली बार ऐसे विश्वस्तरीय सम्मेलन में तकनीकी एवं विज्ञान से जुड़े क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग को लेकर त्रिदिवसीय सत्र का आयोजन किया गया जिसमें हमारे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय एवं जैब प्रौद्योगिकी विभाग के माननीय मन्त्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने निरन्तर अपनी उपस्थिति देकर हिन्दी के विज्ञान प्रेमियों, लेखकों का केवल उत्साहवर्द्धन किया, अपितु यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिन्दी को बढ़ावा देते रहने की अति अनिवार्यता है साथ ही वैज्ञानिकों को विज्ञान के हिन्दी भाषा में लोकप्रिय बनाने हेतु प्रयास करने होंगे अच्छे प्रकाशकों को भी सुधी पाठकों हेतु विद्वान हिन्दी-विज्ञान लेखकों की कृतियों का प्रकाशन करना होगा सरकार द्वारा भी हिन्दी में रचित विभिन्न विज्ञान विषय साहित्य की खरीद कर उसे दूसरों तक पहुँचाना होगा ताकि बाज़ारवाद के द्वारा हिन्दी को उन्नत किया जा सके, साथ ही आम जनता को भी विज्ञान तकनीक के साथ जोड़ा जा सके, उन्हें भी सारी जानकारी सुलभता से प्रदान करवाई जा सके

                द्वितीय स्थान पर बहुराष्ट्र्रीय कम्पनियों के लिए भारत को एक विशाल बाज़ार के रूप में देखा जा रहा है इसलिए उस बाज़ार में अपनी पकड़ को मज़बूत करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिनमें से एक है -राष्ट्र भाषा हिन्दी को सीखना जो कि उनके व्यापार का आधार है ग्राहकों को उन्हीं की भाषा में सूचना और विज्ञापन देने के लिए भारतीय भाषाओं को अपनाया जा रहा है उपभोक्तावाद के ज़ोर पकड़ने पर नई पीढ़ी तेज़ी से बाज़ार को अपनी आवश्यकताओं और अपेक्षताओं के अनुरूप बनाने में विदेशी कम्पनियां कार्यरत हैं और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन है - जनसंचार और मीडिया आज बिना विज्ञापन, संचार माध्यमों के कार्यक्रमों के अस्तित्व की कल्पना असंभव है विज्ञापन, रेडियो, टैलीविज़न, समाचार, पत्र-पत्रिकाओं आदि के द्वारा ही जन-सामान्य तक पहुँचना है और इन सबके लिए विशेष भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है साथ ही बाज़ार भी इस सबसे प्रभावित होता है बाज़ार अपने माल की खपत के अनुरूप ही नई पीढ़ी का निर्माण कर रहा है क्योंकि नई पीढ़ी कमाने खर्च करने में विश्वास रखती है इसलिए बाज़ार भी इनके पीछे-पीछे चलता दिखाई देता है सभी अपने को एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के नागरिक के रूप में देखना चाहते हैं और इसमें सहायक अंग के रूप में उभर कर सामने आती हैं - इंटरनेट सुविधाएं आज इंटरनेट सूचना प्रौद्योगिकी का पर्याय बन चुका है इंटरनेट साहित्य हमारे बहुउद्देशीय विविधतामय जीवन लक्ष्यों को पूर्ण बनाने में सक्षम सिद्ध हो रहा है बाज़ारबाद में आज अगर सर्वोपरि कुछ है तो वह इंटरनेट ही है, जिसने समाज को एक ऐसा धरातल दिया है, जिसने समय और दूरी की अवधारणा को समाप्त कर दिया है जहां व्यक्ति अपने नेट के सहारे कार्य करना चाहेगा, खरीददारी करेगा, बैंक का लेन-देन करेगा बिलों का भुगतान करेगा, पढ़ाई करेगा तो वहीं वह नई सूचनाओं से भी जुड़ा रहेगा

जनसंचार और मीडिया
जनसंचार और मीडिया

                सर्वप्रथम इंटरनेट पर केवल अंग्रेज़ी का ही वर्चस्व कायम था किन्तु अब जापान, चीन, थाईलैंड, फ्रांस आदि देशों ने अपनी भाषा और अपने कोड विकसित कर लिए हैं भारत भी अब पीछे नहीं रहा बाज़ारवाद की मांग पर हिन्दी भाषा ने भी अपनी भाषा और अपने कोड विकसित करके तकनीक कंधे के साथ कंधा मिला लिया है हिन्दी साहित्य के लिए देवनागरी लिपि मेंअनुभूति एवं अभिव्यक्तिनाम से साइट उपलब्ध है जिसकी सदस्यता से साहित्यकार उस पर अपनी रचनाएं डाल सकते हैं हिन्दी में जारी फोंट से आज हर कार्य सुलभ हो गया है और यह सर्वव्यापी सत्ता का रूप धारण कर चुका है
                संचार की इतनी तीव्र गति ने पत्रकारिता और इंटरनेट में कोई भेद नहीं रहने दिया। इंटरनेट से जुड़ते ही विश्व भर के इंटरनेट से जुड़े सभी कम्प्यूटरों से क्षण भर में ही हमारा साक्षात्कार हो जाता है चाहे सिनेमा, खेल, पुस्तकालय, उद्योग, मौसम, शिक्षा, विश्वविद्यालय, वाणिज्य आदि से जुड़ी जहाँ समस्याएं प्रस्तुत होती हैं तो वहीं समाधान भी साथ-साथ मिलते हैं सम्पूर्ण रूप से जिस ग्लोबलाइजेशन की बात की जा रही है असल में वह मुक्त बाज़ार व्यवस्था के प्रभाववश ही सामने आया है
                व्यापार का भी सीधा सम्बन्ध बाज़ार से ही है यह व्यापार चाहे गांव का हो या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का सब जगह एक ही कड़ी है जो इनको आपस में जोड़ने का कार्य करती है और वह है - भाषा भाषा के माध्यम से ही राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाज़ार का स्वरूप निखरता नज़र आता है ग्राहकों को अपने उत्पाद की गुणवत्ता को समझाने के लिए कम्पनियां ग्राहकों को उन्हीं की भाषा में सूचनाएं प्रदान करती हैं ताकि व्यापार को सुलभ तथा कुशलतापूर्वक किया जा सके
                चौथा और अन्तिम तत्व में विस्थापन की बात आती है एन.आर.आई. समुदाय भारत की मिट्टी से जुड़े रहना चाहते हैं इसलिए विदेशों में रहने के बावजू़द भी वे अपने देश की बनी वस्तुओं को खरीदना ज्यादा पसन्द करते हैं इससे भी बाज़ारवाद को बढ़ावा मिलता है साथ ही वह समुदाय अपने पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाज़ आदि का परिचय अपनी भावी पीढ़ी को देने में विश्वास रखते हैं इसलिए वे भाषा के प्रति सजगता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं वे अपनी सार्थक भागीदारी के द्वारा राष्ट्रीय विकास में सहायक बनकर विकास की गति की तीव्रता बनाते हैं और यह केवल भाषा से ही संभव है लगभग एक करोड़ बीस लाख भारतीय मूल के लोग विश्व के 132 देशों में बिखरे हुए हैं जिनमें आधे से ज्यादा हिन्दी से परिचित नहीं फिर भी उसे व्यवहार में लाने के लिए कोशिश करते हैं दूसरी बात विदेशों में भी हिन्दी के पठन-पाठन और प्रचार-प्रसार का कार्य तीव्र गति से हो रहा है भारत से बाहर 165 विश्व विद्यालयों में हिन्दी के अध्ययन की व्यवस्था है यहाँ तक कि विदेशों में भी हिन्दी संस्कृति सभ्यता से जुड़े हुए नाटक भी लोकप्रिय हैं भारतीय हिन्दी चैनलों की मांग विदेशों में भी बढ़ रही है हिन्दी फिल्मों, गीतों, हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार के द्वारा जनसंचार के माध्यमों का भी अहम् स्थान है हिन्दी लोकप्रियता बाज़ार को प्रभावित करती है इसप्रकार मुक्त बाज़ार और वैश्वीकरण के दवाबों ने हिन्दी को ज़रूरत और मांग के अनुकूल ढालने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 
                अंत में कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का भूमण्डलीकरण के सामान्य परिवेश में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को सामने रखकर विकास के पथ पर अग्रसर होना एक बहुत महत्वपूर्ण कदम है, जिससे ना सिर्फ उसकी संस्कृति सुरक्षित है, साथ है, भूमण्डलीकरण एवं बाज़ारवाद के दौर में हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए वह चेतन भी है यह कहा जा सकता है कि बाज़ारवाद और हिन्दी आधुनिक युग में एक दूसरे के पूरक हो गए हैं


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